Bihar Board 12th Geography Question Answer 2025
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Bihar Board 12th Geography Question Answer 2025: यहां से वायरल प्रश्न का प्रश्न उत्तर दिया गया है यहां से देखें, Board Help

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Bihar Board 12th Geography Question Answer 2025

 

Q.1. देश में जल संसाधनों की उपलब्धता की विवेचना कीजिए और इसके स्थानिक वितरण के लिए उत्तरदायी कारक वताइए। (VvI)
Ans. धरातलीय जल के चार मुख्य स्रोत है-नदियाँ, झील, तलैया और तालाब * देश में कुल नदियों तथा उन सहायक नदियों, जिनकी लम्बाई 1.6 किमी से अधिक है को मिलाकर 10.360 नदियाँ है। भारत में सभी नदी बेसिनों में औसत प्रवाह 1859 घन किलोमीटर होने का अनुमान किया फिर भी स्थलाकृतिक जलीय और अन्य दबावों के कारण प्राप्त धरातलीय जल का केवल गया है। लगभग 690 किमी. (32%) जल का ही उपयोग किया जा सकता है। स्थानिक वितरण के कारक भारत में जल के तीन स्रोत है-
1. वर्षा नदी में जल प्रवाह इसके जल ग्रहण क्षेत्र के आकार अथवा नदी बेसिन जल ग्रहण क्षेत्र में हुई वर्षा पर निर्भर करता है। और इस
2. भारत में वर्षा में अत्यधिक स्थानिक विभिन्नता पाई जाती है और वर्षा मुख्य रूप से मानसूनी मौसम केन्द्रित है।
3. नदियाँ : भारत में कुछ नदियाँ, जैसे- गंगा, ब्रह्मपुत्र और सिधु के जल-ग्रहण क्षेत्र बहुत बड़े
हैं। गंगा, ब्रह्मपुत्र और बराक नदियों के जल-ग्रहण क्षेत्र में वर्षा अपेक्षाकृत अधिक होती है। ये नदियाँ यद्यपि देश के कुल क्षेत्र के लगभग एक-तिहाई भाग पर पाई जाती है जिनमें कुल धरातलीय जल संसाधनों का 60 प्रतिशत जल पाया जाता है।
4. मौसमी नदियाँ : दक्षिणी भारतीय नदियों, जैसे-गोदावरी, कृष्णा और कावेरी में वार्षिक जल-प्रवाह का अधिकतर भाग काम में लाया जाता है लेकिन ऐसा बह्मपुत्र और गंगा, बेसिनों में अभी भी सम्भव नहीं हो सका है।

Q.2. भारत में भौम जल (Underground water) की संभाव्यता कुछ प्रदेशों में अधिक है।’ इस कथन की तीन उदाहरणों द्वारा पुष्टि कीजिए।
Ans. 1. भौमजल की संभाव्यता मृदा की प्रकृति वर्षा की मात्रा तथा धरातल के स्वरूप पर निर्भर करती है।
2. जलोढ़ मृदा मैदान : जलोद मृदाओं में जल आसानी से रिस जाता है। यही कारण है कि भारत के उत्तरी मैदान में भौम विकास की संभावनाएं अधिक है।
3. प्रायद्वीपीय भारत : यहाँ चट्टानी भूमियाँ है। अतः जल-रिसाव की गति धीमी होती है और जल का सहज रिसाव नहीं हो पाता। अतः प्रायद्वीपीय भारत में भौम जल की संभावनाएं कम है।
4. कम वर्षा के क्षेत्र : जहाँ वर्षा की मात्रा कम होती है वहाँ भौम जल की संभावनाओं का कम होना स्वाभाविक है। अतः देश के पश्चिमी भागों में भीम जल कम है।
5. अधिक वर्षा क्षेत्रों में भौम जल की संभावना स्वत: ही अधिक होती है। यही कारण है कि देश के उत्तरपूर्वी भागों में भोम जल की संभाव्यता अधिक है।
6. समतल भूमि : वर्षा जल के रिसाव के लिए अनुकूल है। यहाँ रिसाव के लिए अधिक समय मिल जाता है।
7. ढालू भूभागों में भौम जल की संभाव्यता कम रहती है। ढालू भागों में जल शीघ्र बह जाता है. फलत: रिसाव के लिए कम समय मिलता है।
8.42% भौम जल की संभाव्यता देश के उत्तरी राज्यों में पाई जाती है, क्योंकि इन राज्यों में जलोद मृदा की बहुलता, भूमि का मंद ढाल तथा अपेक्षाकृत वर्षा की अधिक मात्रा है।
9. अकेले उत्तर प्रदेश राज्य में देश की 9% भौम जल की संभाव्यता है।
10. महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश तथा तमिलनाडु राज्यों में उनके बढ़े आकार के होने के कारण भौम जल की संभाव्यता अधिक पाई जाती है।

Q.3. वर्षा जल संग्रहण पर एक टिप्पणी लिखें।

Ans. वर्षा जल संग्रहण वर्षा के जल को रोकने और एकत्र करने की विधि है। इसका उपयोग भूमिगत जलभृतों के पुनर्भरण के लिए भी किया जाता है। यह एक कम मूल्य और पारिस्थितिक अनुकूल विधि है जिसके द्वारा पानी की प्रत्येक बूंद संरक्षित करने के लिए वर्षा जल को नलकूपों, गड्ढों और कुओं में एकत्र किया जाता है। वर्षा जल संग्रहण पानी की उपलब्धता को बढ़ाता है, भूमिगत जल स्तर को नीचा होने से रोकता है, प्लुओराइड और नाइट्रेट्स जैसे सदूषकों को कम करके अवमिश्रण भूमिगत जल की गुणवत्ता बढ़ाता है. मृदा अपरदन और बाढ़ को रोकता है और यदि इसे जलभृतों के पुनर्भरण के लिए उपयोग किया जाता है तो तटीय क्षेत्रों में लवणीय जल के प्रदेश को रीकता है। देश के विभिन्न समुदाय लम्बे समय से अनेक विधियों से वर्षा जल संग्रहण करते आ रहे है।। ग्रामीण क्षेत्रों में परम्परागत वर्षा जल संग्रहण सतह संचयन जलाशयों, जैसे-झीलों, तालाबों, सिचाई तालाबों आदि में किया जाता है। राजस्थान में वर्षा जल संग्रहण ढाँचे जिन्हें कुंड अथवा टाँका (एक ढकी हुई भूमिगत टंकी) के नाम से जाना जाता है जिनका निर्माण घर अथवा गाँव के पास या घर में संग्रहित वर्षा जल को एकत्र करने के लिए किया जाता है। बहुमूल्य जल-संसाधन के संरक्षण के लिए वर्षा जल संग्रहण प्रविधि का उपयोग करने का क्षेत्र व्यापक है। इसे घर की छतों और खुले स्थानों में वर्षा जल द्वारा संग्रहण किया जा सकता है। वर्षा-जल-संग्रहण घरेलू उपयोग के लिए भूमिगत जल पर समुदाय की निर्भरता कम करता है। इसके अतिरिक्त मांग-आपूर्ति अन्तर के लिए सेतुबंध के कार्य के अतिरिक्त इसमें भौम जल निकालने में वर्षा जल संग्रहण विधि का देश के बहुत से राज्यों में बड़े पैमाने पर उपयोग किया जा रहा है। ऊर्जा की बचत होती है क्योंकि पुनर्भरण से भौम जल-स्तर में वृद्धि हो जाती है। आजकल वर्षा जल संग्रहण से मुख्य रूप से नगरीय क्षेत्रों को लाभ मिल सकता है क्योंकि जल की मांग, अधिकाश नगरों और शहरों में पहले ही आपूर्ति से आगे बढ़ चुकी है

Q-4. भारत में पेट्रोलियम के उत्पादन एवं वितरण का विवरण दें। [2009, 2012.2015)
Ans. भारत में पेट्रोलियम टर्शियरी युग की शैल संरचनाओं में पाया जाता है। विशेषज्ञा की मान्यता है कि देश के लगभग 14 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में तेल के भंडार है। इसके अतिरिक्त महाद्वीपीय मग्नतट के लगभग 3 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैली परतदार चट्टानों में भी पेट्रोलियम होने का अनुमान है।

उत्पादन: देश में पेट्रोलियम का उत्पादन लगातार बढ़ता जा रहा है। 1951 में 2.69 लाख टन तेल का उत्पादन हुआ जो 1962 में 10.8 लाख टन 1996 में 3.45 करोड़ टन, 1999 में 3.29 करोड़ टन तथा 2006 में 3.20 करोड़ टन हो गया। इन आंकड़ा से यह स्पष्ट है कि देश में पेट्रोलियम का उत्पादन आरंभ में बढ़ा, 1980-81 एवं 1990-91 के दौरान इसके उत्पादन में काफी वृद्धि हुई। परन्तु इसके बाद से इसके उत्पादन में धीमी गति से वृद्धि एवं कमी की प्रवृत्ति जारी है। वितरण : आज देश में पेट्रोलियम उत्पादन के तीन मुख्य क्षेत्र हैं। इनमें असम, गुजरात एवं मुम्बई क्षेत्र (अरब सागर) शामिल है। असम राज्य में नहरकटिया, हुगरीजन, मोरान, लखीमपुर, गुजरात में कलोल, बलोल, अंकलेश्वर, मेहसाना, बादसेर इत्यादि प्रमुख उत्पादक क्षेत्र हैं। मुम्बई हाई तेल क्षेत्र अरब सागर में मुम्बई तट से पश्चिम में है। इसके अलावा कृष्णा-गोदावरी, कावेरी बेसिन तथा बाड़मेर के मंगला क्षेत्र में भी तेल मिला है। देश के कुल तेल उत्पादन का 63% मुम्बई हाई क्षेत्र से 18% गुजरात तथा 16% असम से प्राप्त होता है।

Q.5. अपरम्परागत ऊर्जा-स्रोत के रूप में सौर, पवन, जल, भूतापीय ऊर्जा का वर्णन करें। Or, अपरम्परागत ऊर्जा के स्रोत कौन-कौन से हैं? (2011)
Ans. सौर, पवन, जल, भूतापीय ऊर्जा तथा जैवभार (बायोमास) आदि अपरम्परागत ऊर्जा स्रोत है। ये ऊर्जा स्रोत अधिक आरम्भिक लागत के बावजूद अधिक टिकाऊ, परिस्थितिक अनकूल तथा सस्ती ऊर्जा उपलब्ध कराते है। सौर ऊर्जा फोटोवोल्टिक सेलों में विपाशित सूर्य की किरणों को ऊर्जा में परिवर्तित किया। जा सकता है जिसे सौर ऊर्जा के नाम से जाना जाता है। सौर ऊर्जा को काम में लाने के लिए जिन दो प्रक्रमों को बहुत ही प्रभावी माना जाता है, वे है फाटोवोल्टाइक और सौर-तापीय प्रौद्योगिकी। सौर तापीय प्रौद्योगिकी अधिक लाभप्रद है। यह लागत प्रतिस्पर्धी, पर्यावरण अनुकूलन तथा निर्माण में आसान है। सौर ऊर्जा कोवला अथवा तेल-आधारित संयंत्रों की अपेक्षा 7 प्रतिशत अधिक और नाभिकीय उर्जा से 10 प्रतिशत अधिक प्रभावी है। यह सामान्यतः हीटरों, फसल शुष्कको (crop dryer), कुकर्स (cookers) आदि जैसे उपकरणों में अधिक प्रयोग की जाती है। भारत के पश्चिमी भागों-गुजरात व राजस्थान में सौर ऊर्जा के विकास की अधिक संभावनाएं है। पवन ऊर्जा पवन उर्जा पूर्णरूपेण प्रदूषण मुक्त और ऊर्जा का असामान्य स्रोत है। प्रवाहित पवन से ऊर्जा को परिवर्तित करने की अभियांत्रिकी बिल्कुल सरल है। पवन की गतिज ऊर्जा को टरबाइन के माध्यम से विद्युत ऊर्जा में बदला जाता है। सन्मार्गी पवनों व पछुवा पवनों जैसे स्थायी पवन प्रणालियों और मानसून पवनों को ऊर्जा के स्रोत के रूप में प्रयोग किया गया है। इनके अलावा स्थानीय हवाओं, स्थलीय और जलीय पवनों को भी विद्युत पैदा करने के लिए प्रयुक्त किया जा सकता है। भारत ने पहले से ही पवन ऊर्जा का उत्पादन आरम्भ कर दिया है। इसके पास एक महत्वाकांक्षी कार्यक्रम है जिसमें 45 मेगावाट की कुल क्षमता के लिए 250 वायुचालित टरबाइनें स्थापित की जानी है जो 12 अनुकूल स्थानों, विशेष रूप से सागरतटीय क्षेत्रों में लगाई जाएँगी। ऊर्जा मंत्रालय के एक अनुमान के अनुसार भारत ऊर्जा के इस स्रोत से 3,000 मेगावाट विद्युत का उत्पादन कर पाएगा। गैर परम्परा ऊर्जा-खोत मंत्रालय, तेल के आयात बिल को कम करने के लिए पवन ऊर्जा को विकसित कर रहा है। हमारे देश में पवन उर्जा उत्पादन की संभावित क्षमता 50,000 मेगावाट की है जिसमें से एक चौथाई ऊर्जा को आसानी से काम में लाया जा सकता है। पवन ऊर्जा के लिए, राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र तथा कर्नाटक में अनुकूल परिस्थितियाँ विद्यमान है। गुजरात के कच्छ में लाम्बा का पवन ऊर्जा संयंत्र एशिया का सबसे बड़ा संयंत्र है। पवन ऊर्जा का एक अन्य संयंत्र तमिलनाड के तूतीकोरन में स्थित है। भूतापीय ऊर्जा जब पृथ्वी के गर्भ से मैग्मा निकलता है तो अत्यधिक उष्मा निर्मुक्त होती है। इस ताप ऊर्जा को सफलतापूर्वक काम में लाया जा सकता है और इसे विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित किया जा सकता है। इसके अलावा गीजर और कूपों से निकलते गर्म पानी से ताप ऊर्जा पैदा की जा सकती है। इसे लोकप्रिय रूप में भूतापी ऊर्जा के नाम से भी जानते हैं। इस ऊर्जा को अब एक प्रमुख ऊर्जा स्रोत के रूप में माना जा रहा है जिसे एक वैकल्पिक स्रोत के रूप में विकसित किया जा सकता है। मध्यकाल से ही गर्म स्रोतों (झरनों) एवं गीजरों का उपयोग होता आ रहा है। भारत में, भूतापीय ऊर्जा संयंत्र हिमाचल प्रदेश के मनीकरण में अधिकृत किया जा चुका है। भूमिगत ताप के उपयोग का पहला सफल प्रयास (1890 में) बोयजे शहर. इडाहो (यू.एस.ए.) में हुआ था जहाँ आस-पास के भवनों को ताप देने के लिए गरम जल के पाइपों का जाल तंत्र (नेटवर्क) बनाया गया था। यह संयंत्र अभी भी काम कर रहा है।

Q.6. भारत में जल विद्युत शक्ति के विकास की आवश्यक दशाओं का वर्णन करें।
Ans. जलविद्युत् उत्पादन के लिए कुछ विशेष भौगोलिक दशाओं का होना आवश्यक है। भारत में इसके लिए भौतिक और आर्थिक दोनों ही दशाएँ अनुकूल है। ये आवश्यक भौगोलिक दशाएँ निम्नलिखित है-
(i) पर्याप्त जल मिलना भारत के उत्तरी-पूर्वी राज्यों, हिमालय के पर्वतीय भाग तथा (पश्चिमी घाट पर्वत में पर्याप्त वर्षा होती है और नदियों में सालों भर पानी भरा रहता है। हिमालय से निकलने वाली नदियाँ बड़ी-बड़ी है, जिन्हें सहायक नदियों से भी जल मिलता है।
(ii) जल का निरन्तर प्रवाहित होते रहना : जल के निरन्तर प्रवाहित होने से पनबिजली का उत्पादन सालों भर होता है। भारत में हिमालय से निकलने वाली नदियाँ सदा प्रवाही है, क्योंकि इन्हें गर्मी में बर्फ के पिघलने से जल मिलता है। यह सुविधा दक्षिण की पठारी नदियों में नहीं है, फिर भी वहाँ बाँध और विशाल जलाशय बनाकर उनमें वर्षाकालीन जल एकत्रित कर जलाभाव की पूर्ति की जा सकती है।
(iii) जल का तीव्र वेग से गिरना भारत में जल-वेग के लिए आदर्श स्थिति मिलती है।
देश के पर्वतीय और पठारी भागो में जल तीव्र गति से बहता है और अनेक जलप्रपात पाये जाते है। इससे जल-विद्युत् का उत्पादन सरल हो जाता है। इसके अतिरिक्त बहुउद्देशीय योजनाओं के अन्तर्गत कृत्रिम बाँध बनाकर भी जल को तीव्र गति से गिराया जाता है।
(iv) विद्युत की माँग का व्यापक क्षेत्र भारत में जल-विद्युत् का बाजार काफी विस्तृत है। यह एक विकासशील देश है, जहाँ घरेलू उपयोग के अतिरिक्त कृषि मशीन, औद्योगिक मशीन, रेलगाड़ी इत्यादि में जलविद्युत् की माँग दिनों दिन बढ़ती जा रही है।
(v) शक्ति के अन्य साधनों का अभाव : भारत में कोयला, पेट्रोलियम इत्यादि शक्ति के साधन सीमित क्षेत्रों में उपलब्ध है। उत्तर-पश्चिमी और दक्षिणी भारत में आर्थिक विकास के लिए जलविद्युत् का विकास लाभप्रद होगा।
(vi) तकनीक एवं पूंजी भारत मे जलविद्युत् के विकास के लिए उपयुक्त तकनीक और पर्याप्त पूँजी भी उपलब्ध है।

Q.7. भारत के जल विद्युत उत्पादन पर एक निबंध लिखें। [2009]
Ans. भारत में जल-विद्युत उत्पादन की सभी दशाएँ सामान्य रूप से अनुकूल है। देश में वर्ष पर्यन्त बहने वाली नदियाँ है। पठारी धरातल और प्राकृतिक झरने मिलते है। बाँध निर्माण के लिए श्रमिक और तकनीकी ज्ञान उपलब्ध है। जल-विद्युत के पश्चात् जल का सिचाई में प्रयोग किया जाता है। परन्तु देश में वर्षा का वितरण मौसमी, अनिश्चित तथा दोषपूर्ण है। इसलिए बाँध बनाकर कृत्रिम झीलों से बिजली घरों को जल प्रदान किया जाता है। जल-विद्युत का उत्पादन भारत में आवश्यक है. क्योंकि देश में कोयले तथा तेल के भण्डार पर्याप्त नहीं है। उद्योगों के विकेन्द्रीकरण के लिए जलविद्युत उत्पादन आवश्यक है। एक अनुमान के अनुसार देश में कुल जल राशि में लगभग 90.000M. W. शक्ति प्राप्त करने की क्षमता है। भारत में प्रति वर्ष 322 Billion KWH शक्ति उत्पन्न की जाती है। भारत में जल विद्युत उत्पादन (Hydel Power in India) भारत में जल विद्युत का उत्पादन दक्षिणी पठार पर अधिक है। यहाँ कोयले की कमी है। कई भागों में जल प्रपात पाए जाते हैं। औद्योगिक विकास के कारण माँग भी अधिक है।
1. कर्नाटक : इस राज्य को विद्युत उत्पादन में प्रथम स्थान प्राप्त है। इस राज्य की मुख्य योजनाएं निम्नलिखित है-
(i) महात्मा गाँधी जल-विद्युत केन्द्र (ii) शिव समुद्रम जल विद्युत केन्द्र (iii) शिमसा परियोजना, (iv) शराबती जल-विद्युत केन्द्र
2. तमिलनाडु: इस राज्य की मुख्य जल-विद्युत योजनाएँ निम्नलिखित है-
(i) कावेरी नदी पर मैटूर योजना (ii) पायकारा नदी पर पायकारा योजना (iii) ताम परनी नदी पर पापनसाम योजना (iv) पेरियार योजना तथा कुण्डा परियोजना।
3. महाराष्ट्र (1) टाटा जल-विद्युत योजना, (ii) कोयला योजना, (iii) ककरपारा योजना। 4. उत्तर प्रदेश: इस राज्य में ऊपरी गंगा नहर पर गंगा विद्युत संगठन क्रम बनाया गया है। इस नहर पर 12 स्थानों पर जल प्रपात बनते हैं। इन सभी केन्द्रों से लगभग 23,800 किलोवाट विद्युत उत्पन्न की जाती है। योजनाएँ हैं।
5. पंजाब : पंजाब राज्य में भाखड़ा नांगल योजना तथा व्यास योजना मुख्य जल-विद्युत (i) भाखड़ा नंगल परियोजना (ii) व्यास परियोजना (iii) थीन योजना-रावी नदी पर
6. अन्य प्रदेश:
(i) हिमाचल प्रदेश: इस राज्य की प्रमुख विद्युत योजना मण्डली योजना है। व्यास नदी की सहायक नदी उहल का जल 609 मीटर ऊंचाई से गिराकर जोगिन्दर नगर नामक स्थान पर जल-विद्युत उत्पन्न की जाती है। चमेरा योजना तथा बैरा सियोल योजना अन्य योजनाएँ हैं। (ii) जम्मू-कश्मीर जम्मू-कश्मीर में झेलम नदी वरामूला विद्युत तथा लिदर नदी पर पहलगांव योजना महत्वपूर्ण है

Q.8. भारत में लौह-अयस्क के उत्पादन तथा वितरण का उल्लेख कीजिए। [2015, 2018)
Ans. भारत में लौह-अयस्क के उत्पादन एवं वितरण इस प्रकार है-
भारत में लौह अयस्क का कुल भण्डार 2300 करोड़ है तथा इसमें 68.17% हेमेटाइट का भण्डार है। सम्पूर्ण विश्व का 20% लौह-अयस्क भण्डार भारत में है। हेमेटाइट मुख्य रूप से उड़ीसा, मध्यप्रदेश, झारखण्ड, गोवा, कर्नाटक इत्यादि में पाया जाता है जबकि मैग्नेटाइट मुख्यतः तमिलनाडु, केरल तथा आन्ध्रप्रदेश में पाया जाता है। वर्तमान समय में भारत का 95% लोहा गोवा. मध्य प्रदेश, झारखण्ड, छत्तीसगढ़, उड़ीसा व कर्नाटक में पाया जाता है। सन् 1950 के दशक में भारत में केवल 42 लाख टन लोहे का उत्पादन होता था जो बाद में 2000-01 में बढ़कर 792.1 लाख टन पर पहुँच गया।

Q.9. भारत में कोयले के उत्पादन तथा वितरण का वर्णन करें। VVl
Ans. भारत में ऊर्जा शक्ति का सबसे महत्वपूर्ण स्रोत कोयला है। भारत में कोयले के भण्डार मुख्यतः छत्तीसगढ़ (मध्य प्रदेश), पश्चिम बंगाल तथा उड़ीसा में है जो लगभग 90% है। 2001 तक भारत में 2,11,391 करोड़ टन कोयला उत्पादित हुआ है। 1951 में भारत में केवल 350 लाख टन कोयला उत्पादित होता था, वहीं 2000-01 में यह बढ़कर 3096.3 लाख टन हो गया। कोयले का भारत में वितरण इस प्रकार है-
1. मध्य प्रदेश : मध्य प्रदेश के महत्वपूर्ण जिलों में सिंगरोली, सोहागपुर, ताता पानी, चिरमिरी, रामपुर, करार, कोरवा में कोयला उत्पन्न होता है तथा भारत का लगभग 30% कोयला यहाँ मिलता है। यह कोयला उत्पादन में प्रथम स्थान पर है।
2. झारखण्ड : यहाँ भारत का लगभग 29% कोयला उत्पादित होता है। यहाँ मुख्यतः झरिया, रामगढ़, बोकारो, कर्णपुट, गिरीडीह व चन्दरपुर में कोयला खाने हैं। यहाँ भारत का लगभग 34% कोयला भण्डार है। यह कोयला उत्पादन में द्वितीय स्थान पर है।
3. पश्चिम बंगाल : पश्चिम बंगाल कोयला उत्पादन में तृतीय स्थान पर आता है। रानीगंज,बर्दमान, पुरुलिया तथा बाकुरा क्षेत्रों में कोयला उत्पादित होता है। यहाँ भारत के लगभग 18% कोला भण्डार पाए जाते है।
4. आंध्र प्रदेश आन्ध्र प्रदेश में भारत का कुल 10% कोयला उत्पादित होता है। यहाँ कोयले के लगभग 6.1% भण्डार है। यहाँ कोयला उत्पादित क्षेत्र कोठाडन, तन्दूर व सिगरेनी है।
5. महाराष्ट्र भारत का लगभग 9% कोयला महाराष्ट्र में उत्पन्न होता है। यहाँ कोयला
उत्पादित क्षेत्र वर्धा, बन्दरपुर, घुघुस, बल्लारपुर व वरोड़ा है। यहाँ लगभग 3.3% कोयला भण्डार है।
6. उड़ीसा भारत के लगभग 24% कोयला भण्डार उड़ीसा में पाए जाते है। यहाँ तलवर
कोयला उत्पादक क्षेत्र है तथा भारत का 9.17% कोयला यहाँ से उत्पादित होता है।

Q.10. भारत में वॉक्साइट के वितरण तथा उत्पादन का वर्णन कीजिए।
Ans. भारत में बॉक्साइट के अटूट भण्डार है। यहाँ लगभग 2740 करोड़ टन बॉक्साइट के भण्डार है। बॉक्साइट का प्रयोग मुख्यतः एल्युमीनियम बनाने के लिए किया जाता है। भारत में स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद बॉक्साइट उत्पादन में काफी वृद्धि हुई। 1950-51 में जहाँ बाक्साइट उत्पादन लगभग 68,120 टन था वहीं 2000-01 में यह बढ़कर 7894 हजार टन हो गया। भारत में वॉक्साइट का वितरण भारत में बॉक्साइट उत्पादक राज्य इस प्रकार है- :
1. उड़ीसा : बॉक्साट उत्पादन में उड़ीसा सबसे अग्रणी है। यहाँ कालाहांडी, कोरापुट, सम्भलपुर, सुन्दरगढ़ व बोलनगीर प्रमुख बॉक्साइट उत्पादक जिले हैं। यहाँ भारत का लगभग 1/3 बॉक्साइट उत्पादित होता है।
2. झारखण्ड : बॉक्साइट उत्पादन की दृष्टि से भारत में झारखण्ड द्वितीय स्थान पर है। यहाँ भारत का लगभग 22% बॉक्साइट उत्पादित होता है। बॉक्साइट उत्पादित करने वाला मुख्य क्षेत्र लोहरदगा का पैटलैण्ड्स है।

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